दुनिया का तो पता नहीं मगर बहुत फर्क लगता है मुझे इन चार शब्दों के अर्थ में-
इश्क़,मोहब्बत, प्यार और प्रेम
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इश्क़- इश्क वो होता है जिसमें लोग एक दूसरे की जान ले लेते हैं।
मोहब्बत- मोहब्बत वो होती है, जिसमें बस स्वार्थ के सिवा कुछ नहीं होता। ना घर की खुशी न परिवार का ख्याल।
प्यार- प्यार वो होता है जो बस एक दूसरे के साथ के बिना कभी आगे ही नहीं बढ़ता है? साथ है तो प्यार है नहीं तो उसी वक्त कोई और भी तैयार है?
मगर प्रेम-
प्रेम शब्द ही अपने आप में पवित्र,पूजनीय और विशाल है। जो हर किसी को ना तो होता है और ना ही कभी मिलता है? मगर जब-जब किसी को प्रेम हुआ है? सदियों से, तब-तब वो पास रहे या दूर, तन मिले या मन, आत्मा मिले या रूह, नज़रों के पास रहे या नजरों से बहुत दूर, मगर इस प्रेम में कुछ भी हुआ पर हर एक चीज़ को दोनों तरफ एक बराबर ही महसूस किया गया। इस प्रेम में ना कभी मांग हुई, ना ही कभी स्वार्थ और अगर कुछ हुआ तो सिर्फ त्याग,बलिदान, तपस्या,आशा,उम्मीद, प्रतीक्षा, निस्वार्थ और सबसे बड़ी चीज़ पवित्रता जो सदियों से इस प्रेम में बनी हुई है। जिसके कारण इसे भगवान से भी पहले रखा जाने लगा। क्योंकि प्रेम शब्द ही इतना बड़ा है कि अगर किसी ग़लत इंसान को भी हो जाए तो उसकी गन्दी आत्मा को भी पवित्र कर देता है?
इसलिए कहते हैं कि प्रेम वहीं होता है जहां जरूरत खूबसूरत तन की नहीं बल्कि खूबसूरत मन, आत्मा और रूह की हो।
इसीलिए प्रेम को सबसे ऊपर रखा जाता है और सबसे बड़ी बात कि ये ईश्वरीय प्रेम है,ईश्वरीय वरदान है जो सबके नसीब में बिल्कुल नहीं होता है। क्योंकि इसमें सत्य होता है? असत्य का नाम नहीं होता है और जहां सिर्फ सत्य हो वहां सत्य ही बराबरी कर सकता है मगर असत्य बिल्कुल नहीं।
🙏जहां सत्य है,वहां प्रेम अमर है।👏👏
पूजा ग्वाल गोपा ✍🏻
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